प्रथम भेंट की आखिरी बूंद (संस्मरण)
" बहुत लड़के मुझसे मिलने आते हैं,मैं उन्हें साहित्यिक काम सौंपना चाहता हुँ,परन्तु, उनमें से दोबारा कोई नहीं आया। तुम लोग भी कहीं उन लोगों की तरह तो नहीं ?" यह कथन नये सृजनशीलता के जनक संताली साहित्यकार स्वर्गीय बाबुलाल मुर्मू आदिवासी जी का है। तब उनके कथन के जवाब में हमने (मसीह,रघू,शिबु) कहा था - "नहीं,नहीं, हम लोग वैसे नहीं हैं,हम जरूर आयेंगे आपके वचन को पुरा करेंगे, संताली साहित्य पत्रिका "होड़ संवाद" का संपादन करेंगे"। परन्तु, हम आपके सामने झूठ साबित हुए,हम भी दोबारा आपके पास आ नहीं सके,कारण बताने से गलती स्वीकार करना उचित समझुँगा, हम आपसे माफी मांगने के काबिल भी नहीं रहे। आप गोड्डा झारखंड की धरती में जन्में (12 जनवरी 1939 ) जरूर थे, पर अब हर संताल के गुरू हैं, आप ही की देन हैं,संताली लेखन में नई सृजन-कला की। आपने हमें नई सृजन करते जाने की नसीहत दी थी,बाद में काँट-छांट करने की सीख दी थी। अब हम वही कर रहे हैं। आप ने टी एन बी विश्वविद्यालय भागलपुर से एम ए पढ़ाई करते -करते, बीच में पढ़ाई छोड़ शिक्षक की नौकरी की,यह छोड़ मेलिट्री सर्विस में ज्वाइन किया। तत्पश्चात् संताली साहित्य की ओर आपकी झुकाव ने एक साधारण इंसान से असाधारण बना दिया। आपके रचित निम्नलिखित पुस्तकें सदैव हमें आपके सन्निध्य होने की एहसास दिलाता रहेगा- " कोरताल रावाँक् कान (1970),दिसोम भोकता(1977),सोरोस सेरेञ(1982),आखड़ा रे झाम-झाम(1974) आ়द पा়रसी व्याकरण (1999)। संताली साहित्य सृजन के डगर में चलते-चलते आपने 3 फरवरी 2009 को अंतिम साँस ली। सच में आपके साथ यह प्रथम भेंट हमारे लिए आखिरी बूंद थी।
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