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Thursday, August 13, 2020

कवि की काव्य-दृष्टि

 


कवि हुँ,मैं

कुछ भी सोचुँगा,

कुछ भी बोलुँगा,

तेरी हर अच्छाई-बुराई

पर,

नजर दौड़ाना ,

मेरा काम है।

कवि हुँ,मैं

सब कुछ करूँगा,

सब कुछ सिखाऊँगा,

वह भी,

जो तेरे माँ-बाप,

तेरे आदर्श शिक्षक,

तुम्हें नहीं करा सकता,

नहीं सीखा सकता।

कवि हुँ,मैं

सब कुछ छिपा सकता हुँ,

सब कुछ पचा सकता हुँ,

तेरे उर के टीले भी,

अश्लील श्लोक के अर्थ भी।

कवि हुँ , मैं

सब कुछ आबाद तो,

सब कुछ बर्वाद भी कर सकता हुँ,

मेरे नजरों का मालिक,

मैं स्वयं हुँ,

इसे कहाँ ले जाऊँ,

यह तुम तय नहीं कर सकते,

कवि हुँ, मैं

मुद्दे की बात करता हुँ,

पर

व्याख्यान न देकर,

आधा-आधूरे शब्द,

औरों के हाथ, छोड़ जाता हुँ।

कवि हुँ,मैं

शब्दों के साथ खेलना

मेरा काम है,

मतलब नहीं, आने से समझ तेरे,

मतलब मेरा पुरी हो,

बस,

यही कामना रहता है,मेरा,

अर्थों के लिए,

दूनियाँ के शब्दकोष पड़ी है।

कवि हुँ,मैं

कविता के शब्द मेरी है,

शब्दकोष नहीं,

शब्द के भावार्थ मेरे,

शब्द को क्या अर्थ दुँ,

फैसले के अधिकार भी मेरे हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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