मुझे क्यों
ऐसा लगता है,
कि-
तु न था
न है
न रहोगे
सृष्टि के किसी कण में।
मुझे क्यों
ऐसा लगता है
कि-
तु सिर्फ
बिन दंत मुख से
फिसले हुए शब्द हो
वास्तविकता तेरा
न था
न है
न कभी रहेगा
ब्राह्मण्ड के किसी कण में।
मुझे क्यों
ऐसा लगता है
कि-
मनुष्यों की अंधविश्वास
स्कूल, कॉलेज के
डिग्रियों के साथ बढ़ता जाता है
मुझे नहीं लगता
कि-
मनुष्यों की धर्मांधता
कभी खत्म था
न खत्म है
न कभी खत्म होंगे
संसार के किसी कोने में।
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