विश्वास
जुग-जुग गया जग में
भया न किसी को यह संसार,
पता नहीं
कभी था
कभी होंगे
यह स्वर्ग-द्वार,
फिर भी
मानव विश्वास अपरंपार।
जन्म-जन्मान्तर से लोग
चलते आये हैं
और
चलते जायेंगे
बिना गारंटी के
उस पथ पर
जहाँ उन्हें है विश्वास,
स्वर्णिम स्वर्ग-द्वार की।
बिन देखे
इस स्वर्ग-द्वार के गुरू
हर मोड़ पर,
मिला करते हैं
बात करते हैं, जरूर
स्वर्ग-नरक की
पर अफसोस
नदारत है सुची
इनके पास भी।
कभी-कभी सोचता हुँ
संसार की आबादी के साथ
कितनी भीड़ होगी
वह पथ
जिस पर
स्वर्ग-नरक के विश्वासी
चलते जाते हैं
निरंतर
अटुट प्रेम और आशा के साथ ?
मुझे शिकायत है,
अतीत के
उन इतिहासकारों,
लेखकों,
बुद्धिजीवियों से
जिनका जग में नाम है
क्यों चूक गयी
आपकी लेखनी
ऐसे लोगों के सुची लिखने में ?
आपके समय अलग थे
हमारे समय में लोग
प्रमाण की बात करते हैं
पहचान की बात करते हैं
बिना प्रमाण के बात को

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