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Thursday, July 9, 2020

दामू के लाडली मिरू

दामू के लाडली मिरू (लघुकथा) 👧

कंधे पर लटके गमछे के एक छोर से पसीने से लथपथ शरीर को पोछते दामू हेम्बरम,जून के उमस भरी दोपहर में,खेत किनारे स्थित बबुल के छाँव तले आकाश की ओर टकटकी लगाये कुछ युँ बुदबुदाते हैं-" नेस हों ओकोय बड़ाय चो कम गेये दागा,नोवा सेरमा बोरसा चासोक् दो नित काते मुसकिल एना,(शायद,इस साल भी वर्षा कम होगी,आज के समय में मौनसून के भरोसे खेती करना मुश्किल हो गया है) नोवा दिसाम रे संविधान बेनाव काते आयमा सेरमा पारोम एना,मेनखान ओकोयटाक् सोरकार हों आदिवासी लागित बेनाव कानून ऑटोनॉमस कॉन्सील अनुसूचित क्षेत्र रे बाङ को एहोप् लेदा आर ओना रेयाक् दोसा गे नित नोंडे दाक्,सड़क,हाटिया,इसकुल,हासपाताल, रेयाक् चेत् बेबोसथा गे बानुक्आ (इस देश के संविधान बने कई साल बीत गये,परन्तु,आदिवासियों के अनुसूचित क्षेत्र के लिए निर्मित कानून "ऑटोनॉमस कॉन्सील" देश के किसी भी सरकार ने लागू नहीं किया,जिसका परिणाम स्वरूप आज यहाँ (गाँव) पानी,सड़क,हाटिया,स्कुल,अस्पताल जैसे सूविधाएँ नदारत हैं)। जुदि कानून बेनाव कोक्-आ,तोबे आले लेकाते आले लागित् बेबोसथा ले बेनाव केया, सेरमा सेच् दो ओहो गे कोयोक् होय लेना,उपाय बानक्-आ नोव दारे रे बाबेर तोल तेगे होयोक् तिञा (काश ! कानुन बने होते तो हम अपना व्यवस्था अपने हिसाब से किये होते, कम-से-कम यह आकाश तो निहारना नहीं पड़ता, अब उपाय नहीं है, इस पेड़ पर मुझे रस्सी बांधना ही पड़ेगा) । " सोच ही रहा था,तब उसके छोटी सी बच्ची मिरू ने पीछे से आकर दामू के आँख अपनी दोनों हाथ से तोतली बोली के साथ ढक लिया – "लाय में बाबा ओकोय कानाञ ?,चेत् हुदिस दाम?"( बताए पिताजी मैं कौन हुँ ?क्या सोच रहे हैं ?)। दामू ने एक झटके में अपना गंदी सोच बदल दिया और अपने नन्हीं सी मिरू को बाहों में रोते हुए छिपा लिया।

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