इंसानों के मस्तिष्क में कुछ घटनाएँ ऐसे होती है,जो भूलाए नहीं भूलता
है। वर्ष 2017 में मेरे साथ भी ऐसा ही हूआ। चूँकि मैं पेशे से शिक्षक एवं रूचि से
संताली-हिन्दी भाषा के एक लेखक हूँ। मेरा सपना था कि बड़े-बड़े साहित्यकारों की
तरह मैं भी साहित्य-सृजन के कामों से सरकारी खर्चों में देश के भिन्न-भिन्न शहरों
का मूफ्त में उड़न खटोला पर उड़ता फिरूँ। यह सपना 26 मार्च 2017 को सूबह करीब 10
बजे सच होने जा रहा था। चूँकि, मुझे साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित "नॉर्थ-ईस्ट एंड नॉर्दन राइटरस् मिट 2017" के सम्मेलन में भाग लेने हेतू दिल्ली जाना था।
हवाई टिकट बूकिंग के साथ ही मेरी उत्सुकता इतनी बढ़ गयी थी कि इसे मैं शब्दों में
बयाँ नहीं कर सकता। यात्रा के एक सप्ताह पहले से ही मैंने यूट्यूब में हवाई सफर के
नियमों को, सिट बेल्ट लगाना,बोर्डिंग पास, बैगेज क्लेम एरिया, केबिन क्रु, बैगेज
चेक इन, आदि की जानकारी इकट्ठा कर रहा था। इस प्रयास में मैंने कई बार सपने में
हवाई यात्राएँ कर ली थी,लेकिन हर सपने के दृश्य एवं अनुभव मुझे अलग-अलग दिखाई दी
थी। इतना कुछ होने के बाद भी मेंरे उत्साह में कोई कमी नहीं था। मैं रोज उपरोक्त
नियम-कानूनों को देखा करता था। जिन लोगों के हवाई यात्रा की जानकारी मुझे थी,मैंने
उनसे भी सम्पर्क करके हवाई सफर के नियमों को जानने का प्रयास किया। अब करीब-करीब
मुझे लगने लगा था कि मैं आराम से बिना किसी परेशानी का हवाई यात्रा कर लुँगा।
24 मार्च 2017 को मेरी यात्रा शुरू होती है,
दोस्त,मसीह मरण्डी के साथ रेलगाड़ी द्वारा। हमने पाकुड़ (झारखंड) स्टेशन से 4 बजे
शाम वाली एक वर्दमान लोकल ट्रेन पकड़ी। यह ट्रेन लगभग 11 बजे रात में वर्दमान
स्टेशन पहुँची। हम वर्दमान में उतर गए। सूबह वाली ट्रेन के प्रतिक्षा में हमने
वहीं पर स्टेशन के सामने खुले मैंदान में कुछ देर विश्राम करने का विनिश्चय किया।
दोस्त, मसीह ने दस-दस रूपये का दो प्लास्टिक खरीद लाया,उसे बिछाया और हमने उसमें
आड़ा-तिरछा जगह के हिसाब से अपने आप को व्यवस्थित किया। सोने के प्रयत्न के क्रम
में, मच्छरों के झुंड ने मुझे काफी परेशान किया। नींद लग रही थी, मगर सामान चोरी
होने का डर और मच्छरों के डंक ने मुझे गहरी नींद लेने से वांछित रखा। दूसरी तरफ
दोस्त,मसीह आराम से उन्हीं मच्छरों के सुरीली आवाज के बीच खर्राटा मार रहे थे।
सूबह करीब 4 बजे सफाई कर्मी के आने से हमें उस जगह को खाली करना पड़ा। हम वहाँ से
हटे। आँख में पानी का छींटा मरने के बाद, टिकट काउन्टर जाकर टिकट लिये। 4.20 बजे
पुर्वाह्न् के ट्रेन पकड़ हमारी यात्रा
हावड़ा के लिए आगे बढ़ी। 6.30 बजे हावड़ा पहुँचे। पहुँचने पर, ढेर सारी कंपनी
दोस्तों के साथ भेंट हो गई। 25-26 मार्च 2017 को हमारे सिनियर लिडरों के द्वारा
संतरागाछी के एक पाँच सितारा होटल में ट्रेनिंग होनी फिक्स थी। हम हावड़ा स्टेशन
से झुंड में एक बस पकड़ कर होटेल की ओऱ रूख किये,पहुँचे,एक दिन की ट्रेनिंग ली।
ट्रेनिंग बहुत ही बढ़िया थी, कम्पनी के बारे में मुझे काफी जानकारी मिली, मेरा हर
अहं दूर हो रहा था, जसवीर एवं विकास महागुरू के हर शब्दों में एक अदद वजनदार
जिंदगी जीने की शिक्षा मिल रही थी, पिछली रात को न सो पाने का गम बिल्कुल भी नहीं
था। ट्रेनिंग में कम्पनी का डायमंड बनने का भूत सवार हो गया। मैंने पुरी तन्मयता
के साथ ट्रेनिंग में भाग लिया। ट्रेनिंग का प्रथम दिन शाम के 8.30 बजे डिनर के साथ
समाप्त हो गया था। हम सभी अपने- अपने कमरे के अंदर चले गए। सोने से पहले मैं बड़ा
उधेड़ बुन में था, क्या करें ? क्या नहीं ? वाली स्थिति। क्योंकि, 26 मार्च के
लिए, दो में से एक को चुनना था। ट्रेनिंग या हवाई सफर। ट्रेनिंग भी ऐसा था, जो
मेरी जिंदगी, लाइफ स्टाइल, को बदलने वाली थी और इधर मेरा कई सालों का सपना हवाई
सफर भी, जिसके लिए मैंने एक सप्ताह पहले से रिहर्सल किया है। अंत में मैंने, हवाई
सफर को तरजीह दिया। क्योंकि, यह अवसर मेरे लेखनी के दम पर मिल रहा था, जो मेरा
सपना भी था।
26 मार्च की सूबह मैं
दोस्त, मसीह के साथ जल्दी ही तैयार हो गया था। रिसेप्सन में जाकर, एक केब बुलाया
और हम दोनों दमदम हवाई अड्डा के लिए निकल पड़े। समय से पहले ही हम पहुंच गये थे।
कुछ देर तक दोनों दोस्त, कौतूहल पुर्वक हवाई अड्डा के एक-एक चीजों को बड़े ही
उत्सुकता पुर्वक देख रहे थे । ट्रॉली के ऊपर सामान चढ़ाना हो या आवागमन की जानकारी
पट्टी का प्रदर्शन। एक के बाद एक आती-जाती केब की कतारें हो या उनमें से उतरते
भाँति-भाँति के लोगों की मनमोहक विभिन्नताओं की दृश्य । हमें कुछ अलग ही दुनियाँ
नजर आ रहा था। ऐसा लग रहा था, मानो हम कोई दुसरी दुनियाँ अचानक जा पहुँचे हों। ऐसा
दृश्य हम सिर्फ फिल्मों में ही देखे थे। दोस्त, मसीह एक-दो शेल्फी लेने से नहीं चूके। जानकारी के
अभाव में मैंने अपना सैमसंग मोबाइल दोस्त को दे दिया था। मुझे पता चला था कि
एंड्रयड मोबाइल अंदर नहीं ले जाने देगा। जो बाद में गलत साबित हुआ। कुछ देर बातें
करने के बाद निर्धारित समय से ठीक दो घंटे पहले शेड्युल के हिसाब से दोनों दोस्त
बिछड़े। मैं टिकट और आधार कार्ड दिखाकर अंदर चला गया। अंदर जाने के बाद मुझे बोर्डिंग
पास कहाँ से मिलेगा, युट्युब का सारा जानकारी बेकार साबित हो रहा था। बैग कहाँ से
चेक इन होगा, कोई पता नहीं चल रहा था। किसी को बिना पुछे करीब आधा घंटा इधर से
उधार भटकता रहा। ऐसा करते- करते मैं घरेलू उड़ान से अन्तरराष्ट्रीय उड़ान की ओर
चला गया। थक हर कर मुझे एक शौचालय दिखाई दिया। वहाँ गया, हल्का होने के बाद, आँख
में पानी का छींटा मारा और फिर से इधर-उधार नजर दौड़ाते हुए आगे बढ़ रहा था। तभी
मुझे युनीफॉर्म पहने हुए एक शख्स दिखाई दिया। उनसे पुछा, बोर्डिंग पास कहाँ से
मिलेगा? उसने तुरन्त, मेरा टिकट देखा और एक स्ट़ॉलनुमा ढ़ाँचा की तरफ इसारा किया।
जहाँ पर एयर इंडिया लिखा हुआ था। उसने मुझे कतार संख्या भी बता रखा था, मैं वहाँ
गया। चेहरे पर संकोच भाव के साथ एक 13-14 आयू वर्ग के लड़की के पीछे पंक्ति में
खड़ा हो गया। मैं उसके साथ क्या-क्या हो रहा है, सब कुछ बड़ा ही गंभीर पुर्वक देख
रहा था, क्योंकि, अगले ही क्षण मेरा बारी आने वाला है। उनसे आधार कार्ड मांगा गया।
मैंने भी झट से अपना आधार कार्ड अपने हाथ में ले लिया। मेरी बारी आयी।टिकट दिया।
आधार कार्ड दिया। सामान को मशीन में चढ़ाया। वहीं से मेरा सामान अंदर चला गया। अब
मैं खाली हाथ हो गया। साथ में एक छोटा बैग था। उसमें भी एयर इडिंया का एक टैग लगा
दिया गया। बोर्डिंग पास अब मेरे हाथ में था। मुझे वहां पर बोर्डिंग टाइम और गेट
संख्या बता दिया गया। मैं थोड़ा साहस पाकर हाथ में पास लिए आगे बढ़ा। वहाँ लोग
टेढ़े-मेढ़े रास्ते होकर चेक इन के लिए जा रहे थे। मैंने गलती से गलत रास्ता चुना
और महिला चेक इन काउन्टर पर जा पहुँचा। मुझे थोड़ा डाँट सुनना पड़ा। फिर से पुरूष
वाला पंक्ति में आना पड़ा। सभी लोग, बेल्ट,घड़ी,पर्स,मोबाइल,सिक्के,लौपटॉप सब ट्रे
में सजा रहे थे। मैं भी एक आदर्श बालक की तरह हर क्रियाकलाप का ईमानदारी से पालन
कर रहा था। कुछ ही देर में चेक इन के पंक्ति में खड़ा हो गया। मेरे आगे खड़े शख्स
की चेकिंग चल रही थी,तभी मैंने गलती से येलो लाइन को पार कर लिया था। तुरन्त, ही
मुझे सुधारा गया। मेरी बारी आयी। जाकर दोनों हाथों को उपर उठाते हुए खड़ा हो गया।
पैंट के पोकेट में एक सिक्का फँसा पड़ा था,उसके चलते मुझे रोका गया। सिक्का
निकाले,तब मुझे आगे जाने दिया गया। बाकी लोगों की तरह मैंने भी अपना सामान उठाया।
बेल्ट,घड़ी, आदि पहना, तब फिर आगे बढ़ा। अब मैं गेट खोजने में लग गया। चूँकि, मैं
बाहर में पसीना-पसीना हो गया था, मुझे प्यास भी लगी हुई थी। एक जगह पानी पीने गया।
दो-तीन यंग लेडी पानी पी रही थी। उनके हटने के बाद जब वहाँ गया, तो मेरे लिए
मुसीबत खड़ी हो गई। क्योंकि, पानी पीने का तरीका अलग था। घुंडी घुमाने पर पानी उपर
की ओर फेंकता था। मैं पानी पीने से वांछित रह गया। अब गेट की तलाश जारी था । गेट
19 मिला, 20 भी मिला, अब 21 की बारी थी। अब मैं अपने गेट संख्या के पास अपने को
पाकर बहुत खुश था। गेट के अगल-बगल पड़ी चेयर पर मैंने अपना बैग रखा और वहीं बैठ
गया। लंबी साँस लेकर मैं आराम से बैठ गया, मानो, एक राउन्ड में जीत हासिल कर लिया
हो। बोर्डिंग के लिए अब भी एक घंटा समय बचा हुआ था। बैठे-बैठे मैं पारदर्शी काँच
के पार से उड़ती-उतरती हवाई जहाज को बाकी लोगों से नजरें छिपाते हुए देख रहा था।
कुछ देर बैठने के बाद प्यास तेज हो गई और फिर एकबार पानी पीने के प्रयास में निकल
पड़ा। इस बार उस तरह का सिस्टम नहीं था। पानी पी लिये तथा बोतल में भी भर लिये। अब
बारी आती है भूख की। मैंने एक दो दुकान पर देखा। घुघनी मुढ़ीं सदृश कुछ खाने को
नहीं मिला। अंत में मैंने एक पवरोटी नुमा चीज खरीदा, जिसका दाम मेरे हिसाब से
15-20 रूपये के आस-पास होगी, परन्तु, उसके लिए मुझे 150 रूपये देने पड़े। 200 मिली
पानी बोतल का दाम 60 रूपये देने पड़े। मैं पुन: उस जगह गया बैठकर रोटी खायी और पानी
पीया। अब मैं शूकून से उड़ान के इंतजार में था।
हवाई अड्डा के उन सारे व्यवस्थाओं को देखते-देखते कब समय गुजरा
मुझे पता नहीं चला। बोर्डिंग के लिए एनाउंस्मेंट हो गया, लोग कतार में खड़े होने
लगे। मैं भी खड़े होने में देर नहीं लगाई। परन्तु, एक गलती यहाँ भी कर दी। मैंने
गलत रॉ के लोगों के साथ खड़ा हो गया था। मुझे पीछे किया गया। बाद में मैं सही रॉ
के साथ खड़ा हो गया। अब मैं अंदर जा रहा था, मन में तमाम तरह के प्रश्न लिए हुए,
कि अंदर में क्या वतावरण होगा, सीट कैसे मिलेगी, बेल्ट कैसे बाँधेगे आदि-आदि। लंबी
सी सुरंग नुमा टेढ़े-मेढ़े रास्ते ने मुझे ठीक विमान के गेट में ला खड़ा किया।
वहाँ, सभी यात्रियों को टिकट स्क्रीनिंग के बाद अंदर जाने दिया गया। अंदर प्रवेश
करते ही गेट पर स्वागत करने के लिए कुछ युवतियाँ खड़ी थी। सभी लोग अंदर गये, मैं
भी अंदर गया। सीट का कोई जानकारी नहीं होने के कारण, मैंने एक युवती को अपना टिकट
दिखाया। इसारे से उन्होंने सीट बता दिया। बैठने के कुछ देर बाद पता चला कि यही लोग
केबिन क्रु है। हम सारे लोग बैठ चूके थे। क्रु के द्वारा उड़ान के पहले कुछ चीजें
बतायी गई, कुछ कान में तो कुछ बाहर चली गई। परन्तु, एक बात पक्का कान में आयी थी और
वह थी, पानी में लेंडिंग वाली बात। कुछ देर के लिए मैं डर गया था,परन्तु, एक
साकारात्मक सोच ने फिर से मुझे उबार लिया था, मैं अकेले थोड़े न हुँ, इस विमान
में। इतने सारे लोग आते-जाते हैं, विमान में। मन पुरा ढांढ़स में आ गया था। लेकिन,
साथ ही एक उत्सुकता जग गयी थी। धरती को उपर से देखने की। लेकिन, केबिन के बाद
तीसरी रॉ पर डी न. सीट मेरा था। जहाँ से नीचे देखना संभव नहीं था। एक बुजूर्ग ने
सीट एक्सचेंज करने की ऑफर दिया था, परन्तु, जानकारी के अभाव में मैं सीट किसी को
देना नहीं चाहता था और यह कहकर मना कर दिया कि विमान में यह मेरी पहली यात्रा है।
वह मुझे बिजनेस क्लास में जाने के लिए कह रहा था। बाद में फिर एक बुजूर्ग महिला ने
एक खिड़की वाली सीट ऑफऱ किया ,तो इस बार नीचे देखने की लालच ने मुझे सीट एक्सचेंज
करने का हिम्मत दिया। मेरी सीट अब खिड़की के बगल वाली हो गई। अब नीचे देखने की
सपने भी सच हो रहा था। विमान ने उड़ान भरी, कुछ देर थोड़ा उथल-पुथल के बाद विमान
सामान्य हो गये। क्रु का लंच रेडी हो गया। मेरे पास भी आया। परन्तु, जानकारी के
अभाव में हाथ नहीं बढ़ा रे थे, क्योंकि, पवरोटी का दाम मुझे पता चल चूका था। क्रु
का अंग्रेजी भी मेरे समझ से बाहर था। बाद में क्रु को हिंदी में बोलना पड़ा, आपको
अलग से पैसा देना नहीं होगा। यह टिकट के साथ शामिल है। इस पर मुझे शर्म तो आयी, पर
मजबूरी भी था। बगल वाली लड़की मुझे घूर रही थी। कोई बात नहीं, मुझे सहना
पड़ा,अनाड़ी जो हुँ।
अब, विमान अपने उपरी उड़ान पर थी, बगल के सब लोग सो रहे थे, मैं बीच-बीच में इस मौके का फैदा उठा रहा था, नीचे देखता था, कभी-कभी जब डर लगता था, तो अचानक सिर को झटके से खिड़की के दूसरी ओर कर लेता था। फिर जब थोड़ा डर सामान्य हो जाता ,नीचे देखता था । इस तरह से यह आँख मिचौनी खेल अंत तक चलता रहा। लगभग दो घंटे सफर के बाद एनाउन्समेंट होता है,कि अब लेंडिग होने वाली है, अपना-अपना सीट बेल्ट बाँध लें, हलाँकि, मुझे परेशानी नहीं हुई। मैंने बेल्ट मुश्किल से बाँधा था,खुला नहीं था। कुछ देर बाद मेरे परेशानियाँ, बढ़ने लगा,कान से कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था, कान में हल्का दर्द महसुस हो रहा था। क्रु मेम्बर की बात सुनने में दिक्कत हो रही थी, मैं चिन्ता में पड़ गया था, कुछ जरूरत पड़ेगा, तो क्रु को कैसे बुलाऊँगा। क्योंकि मैं किसी के बात को सुन नहीं पा रहा था। कान पट्टी का दर्द बढ़ रहा था। इसी उधेड़ बुन में ही कुछ देर के बाद दिल्ली इंटरनेशनल हवाई अड्डा पर हमारी विमान लेंड हो गयी। लेंड होने पर सभी सहयात्री अपने-अपने परिवार वाले को लेंड होने की खबर दे रहे थे, मैंने भी अपना छोटा मोबाइल निकाला और घर पर फोन लगाया कि मैं दिल्ली पहुँच गया हुँ। एयरपोर्ट से बाहर निकलते-निकलते मैं किधर निकल गया,फिर से प्रस्थान की तरफ चला गया था। मेरे रिसीविंग के लिए आये हुए, दोस्त का भतीजा अन्नु, एरायवल में मेरा राह देखते रहे। काफी देर तक नहीं पहुँचने पर उन्होने फोन किया, मैं कहाँ हुँ, के बारे में जाना, तब केब लेकर आया और घर सरोजिनी नगर सरकारी क्वॉटर ले गया। इस तरह से मेरी हवाई सफर कुछ खट्टी-मिटठी अनुभव के साथ समाप्त हो गई।
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वर्धमान स्टेशन के बाहर विश्राम करते हूए

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