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Thursday, July 16, 2020

माँ (कविता)

माँ

जब मैं नन्हें हाथ उठाती थी,

तेरी खूशी का ठिकाना न होता था,

जब मैं पैर उठाती थी,

तब भी कितनी खूशी का इजहार करती थी,

जब मैं नन्हें हाथों के बल खड़ा होता था,

तब भी तेरी आँखों से खूशी के आँसू टपक पड़ते,

और जब एक कदम भी आगे बढ़ा पाती,,

तेरी रोम रोम में,

सुख का समंदर उमड़ पड़ती,

अपने मूँह से,

जब तोतली बोली निकाल पाती,

तब भी तुम कितनी सहज से,

मेरे बोली को समझ लेती थी,

पर

माँ

अब मैं बड़ा हो गया हुँ,

मेरे हाथ बड़े हो गये,

मेरे पैर बड़ी हो गयी,

मेरी बोली अब तोतली नहीं रही,

फिर भी मैं,

असमर्थ क्यों हो गया?

न यह पैर,

न यह हाथ,

और

न ही यह बोली,

काम आ रही है,

तथाकथित

मुख्य धारा के लोगों साथ,

चलने में,

हाथ मिलाने में,

और तो और

उन्हें समझाने में।

माँ

अब एक खूश खबरी सुनाता हुँ,

मेरी ना, अब एक घर होगी,

ठीक मूख्य सड़क के किनारे,

दस बाइ आठ का एक कमरा होगा,

सामने से पाँच फिट की एक बरामदा होगी,

अब मुझे,

जंगल से मूख्य धारा में लाया जायेगा,

मेरे खेत,

खलिहान में,

अब,

मैं नहीं,

सियार,गीदड़,बाघ,भालू रहेंगें,

जलाशय बनेंगें

कोयला,सोना,पेट्रोल

निकाला जायेगा।

पर

माँ

आश्वासन मिला है,

कोयला,पेट्रोल ढोने का काम

मुझे ही मिलेगा।

माँ

विश्वास करो

यह नौकरी

मेरे लिए पक्की है।

 

 

 

 

 

 

 


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