एशिया महादेश के दक्षिणी छोर पर स्थित एक भू-भाग में "सुसुक" नामक आदिवासी रहते थे । यह जन जाति अपने धर्म-दर्शन एवं संस्कृति में एकदम बाकी से भिन्न नजर आते थे। यह अपने काबिले में ही शादी रचते थे। अपने पूर्वजों के धर्म-दर्शन का पालन करते थे। यदि किसी कारणवश किसी तीसरे लोगों का पदार्पण चाहे वह स्त्री हो या पुरूष, प्रेम बंधन में बाँधकर इस काबिला के रीति-नीति को भंग करने का प्रयास करता , तो उन्हें यह काविलाई समाज अपने दण्ड-विधान के अनुसार दंडित करते थे, जिसे काबिलाई समाज "गोजर" कहते थे। उन समाज के भाषा में इसका अर्थ "समाज से बाहिष्कार था"।
एक दिन की बात है, काबिला में जेरेट नाम का एक लड़का सभी को चैलेंज करता है कि- वह पूर्वजों के धर्म-दर्शन को नहीं मानेंगे। वह जैसा जीना चाहता है,वैसा ही जीयेगा। इतना कहकर वह भीड़ को चीरते हुए बाहर चला जाता है। अब एकत्रित भीड़ में से एक बुजूर्ग ने भीड़ को संबोधित करके कहा-" उलीडू मानाले, बेली पाटनदा"(सुनिये सब लोग, हमारे बीच अब अनर्थ होने वाला है)। "मिली मुलुँगा जेरेट, पंके पोड़ानी चेरी"( ना बालक जेरेट, हमारा सब नष्ट करने वाले हैं)। "लापुङ गोजोड़ "(उन्हें रोकना होगा)। यह कहते ही भीड़ में सन्नाटा छा जाता है। कोई किसी से बात नहीं करता है। अंत में भीड़ अनकहे ही तितर-बितर हो जाती है।
इस घटना के तीन मास बाद फिर एक दूसरे युवक पेलिन भी यह कहकर काबिला को छोड़कर चला गया कि- "पूर्वजों का धर्म-दर्शन और संस्कृति आप सबों को मुबारक हो"। इस बार काबिला के बुजूर्ग ने कुछ भी नहीं कहा। इस घटना के बाद से वह शांत-चित भाव से एक पेड़ (काबिला का धार्मिक पेड़) के नीचे तपस्या में लीन हो गया। समय के बदलते स्वरूप के साथ काबिला के युवक-युवती अपने समाज को ठोकर मार, मार कर निकलते चले जा रहे थे। अब उन्हें रोकने वाला कोई नहीं था, जो थे, वे उतने प्रभावशाली नहीं थे। जिसे पूर्वजों के धर्म-दर्शन व संस्कृति का मर्म मालूम था, वह तो तपस्या में लीन था ।
काबिला से भागे सभी युवक-युवती बाकी दूनियाँ से कदम मिलाते हुए अपने-अपने हिसाब से जीवन जी रहे थे। बाहरी समाज के लोगों के साथ जितना हो सकता था, उतना पढ़,लिख रहे थे। अब वे समाज के गिनती में आते तो थे, मगर, उनके उत्पाद न तेरह में न तीन के गिनती में आते थे। असभ्य से सभ्य के गिनती में तो आये,परन्तु,बिना धर्म-दर्शन और संस्कृति के साथ, जो उन्हें अब गवाँरा लगने लगा था। ऐसे ही जो स्वतंत्र रूप से जीने वाले जोड़ी में से किसी एक ने भी अपना पूर्वजों के सीखे बातों को नजर अंदाज किया, वे बिंदास जी रहे थे और जिस जोड़ी में से एक ने भी अपने पूर्वजों के बातों को पकड़े रखा ,वे किसी तरह से जिंदगी काट रहे थे। उन्हीं जोड़ी में से जेरेट का भी जोड़ी था। एक दिन जब पहले बच्चे का नामकरण हो रहा था। जेरेट पूर्वजों के नामकरण को तरजीह दे रहा था,जबकि उसके पत्नी जो अब अलग धर्म-दर्शन समूदाय से आते थे, अलग नामकरण व्यवस्था को अपनाना चाह रही थी। यही था, उनके जीवन दूखी होने का कारण। परिणाम यह हुआ कि शिशु का दो नाम हो गया- पिता का दिया नाम- कुंदेर फकन जेरेट (जहाँ, फकन, जेरेट के पिता का नाम था) तथा पत्नी सुलेम द्वारा दिया नाम- कुंदेर सुलेम जेरेट( पत्नी के नामकरण संस्कार में पत्नी का नाम भी बच्चे के नाम के साथ जोड़ा जाता था), जो जेरेट को पसंद नहीं था। अब उस प्रेम में यह नन्हीं सी दरार प्रकट हो गई, जिसे पाने के लिए दोनों ने कूछ न कूछ त्याग किया था। जेरेट ने तो अपने पूर्वजों के धर्म-दर्शन को धता बताकर,ठेंगा देखाकर, सुलेम संग हो लिया था,ठीक उसी तरह सुलेम ने भी अपने बाबा की बात नहीं मानीं थी, तभी तो उनके बाबा अब भी सुलेम से बात नहीं करता है। सुसूक काबिला को छोड़ने वाले हरेक जोड़ियों की कहीं न कहीं यही कहानी थी। उनके साथ भी, जीवन के किसी न किसी मोड़ में जेरेट परिवार की तरह, इस तरह की प्रेमी बंधन को तोड़ने वाला लकीरें आँख मिचौली खेला करती थीं। अर्थात्, सबके साथ कूछ न कूछ खटपट लगा रहता था। जिसे प्रमाण करना आसान था कि उनके साथ कूछ अदृश्य चीजें थी, जो वे छोड़ना नहीं चाहते थे,और उनके इस प्रवृति ने हीं उन्हें उल्टी दिशा में चलने को प्रेरित कर रहा था।
इधर, तपस्या में लीन बुजूर्ग उसी अवस्था में अगले चालीस साल के बाद एक रात को ईश्वर का प्यारा हो गया था। चूंकि, बुजूर्ग के गहन समाधि में चले जाने के बाद, काबिला के कूछ चेला मिलकर बुजूर्ग के धर्म-दर्शन संस्कृति को बढ़ाते चले आ रहे थे। बुजूर्ग के परमात्मा में विलीन होने के बाद से काबिला त्याग जोड़ियों में धर्म-दर्शन की दर्रारें बढ़ती गई। सभी काबिला त्यागने वाले पर आफत मंडराने लगे, उन्हें बुजूर्ग के बताये मार्ग सताने लगे थे। दूसरी तरफ बाहरी समाज वाले भी अपने-अपने पूराने धर्म-दर्शन के मार्ग की ओर खींचे चले जा रहे थे। इसका इतना गंभीर परिणाम हुआ कि सभी जोड़ियाँ अपने-अपने बच्चे बाँटने लगे। बच्चे की संख्या विषम की स्थिति में बच्चे काटने लगे थे। दृश्य इतना विभत्स हो गया था, कि एक मानव का वहाँ (परिवार में) टिक पाना संभव नहीं था। जेरेट व्याकुल होकर अपने हिस्से का एक बच्चा और एक दूसरे बच्चा का आधा सिर,आधा धड़,और एक पैर कंधे में लेकर अपने खोये हुए काबिला की तलाश में निकल पड़ा था।
नोट- इस कहानी के सभी पात्र का नाम, और उनके द्वारा कहे गये कथन सभी काल्पानिक हैं, कहानी में निहितार्थ भी असली जिंदगी से कोई मेल नहीं खाती है।
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