hisaliya75.blogspot.com

Monday, July 13, 2020

बिन अंकुश के घोड़े


न जाने

कहाँ से आये हैं,ये

कूल की न सही पता

न नस्ल की

फिर भी

चलते-फिरते

बे फिकिर होकर

मेरे घर के इर्द-गिर्द,

फैली हरी घास के आस में।

मुझे खूशी होती थी,

इनके विचरण-चरण ताल से,

तनिक भी एहसास नहीं था

कि-

इनके पैरों से कभी

मेरे ही आंगन की गमला फूटेगी,

परन्तु,

ये तो चलते जाते हैं

बिन लगाम घोड़े की तरह

असंख्य दुब घाँस को रौंदते हुए।

रोज-रोज की दृश्य यह देख

आखिर किस-किस पर

तरेरूँ अपनी लाल आँखे ?

समझ रहा हुँ, सब कुछ

सपनों के स्वर्निम स्मरण से

कि-

घोड़े को उकसाया था किसने ?

परन्तु, आवाक् रह गया

यह सुनकर

लगाम खुलवाया था

परिवार के मुखिया ने ही

अपनों संग मिलकर।

 


No comments:

Post a Comment

21वीं सदी की सबक

चौरासी युनियों में से  अपने को सर्वश्रेष्ठ जीव जगत को अपना जागिर समझने वालों आखिर तुम्हारी कौन सी मूर्खता ने इस मुकाम तक ला खड़ा किया है  जह...